आइये, माँ दुर्गा के पावन क्षणों में खो जाएं और उनके आशीर्वाद को महसूस करें।
वर्ष 2016 में माँ दुर्गा का दिव्य रूप हमें शक्ति, सुख और समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान कर रहा था।
2017 में माँ दुर्गा की अनंत कृपा से हर भक्त के हृदय में विश्वास और उमंग की रोशनी जगमगाई।
वर्ष 2018 में माँ दुर्गा का स्वरूप सजीव प्रतीत हुआ, जिन्होंने हर संकट को दूर कर जीवन में आशा का संचार किया।
2019 में माँ दुर्गा की पूजा से प्राप्त हुई आशीर्वाद की ऊर्जा ने हमारे मन को प्रेरणा और संबल से भर दिया।
माँ दुर्गा का पावन रूप 2020 में भी अनवरत भक्तों के जीवन में उज्जवलता और आध्यात्मिक शक्ति का संचार करता रहा।
वर्ष 2021 में माँ दुर्गा का दिव्य स्वरूप हर भक्त के मन को शांति, शक्ति और सच्चाई का संदेश देता रहा।
2022 में माँ दुर्गा की अनमोल छवि ने भक्तों के हृदयों में प्रेम, भक्ति और असीम विश्वास का दीप जलाया।
2023 में माँ दुर्गा का रूप शक्ति और सौम्यता का अनुपम संगम बनकर हमें हर कठिनाई से उबारने वाला बना।
वर्ष 2024 में भी माँ दुर्गा का दिव्य रूप हमारे जीवन में सुख, समृद्धि और अनंत आशीर्वाद लाता रहा।
महागौरी माता की उपासना से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और जीवन में पवित्रता का संचार होता है। उनकी कृपा से साधक को आत्मबल, धैर्य और दिव्य प्रकाश की प्राप्ति होती है। माता महागौरी करुणामयी और शांति स्वरूपिणी हैं, उनकी आराधना से घर-परिवार में सौहार्द और समृद्धि बनी रहती है। जो भक्त निष्ठा और श्रद्धा से महागौरी का ध्यान करते हैं, उनके जीवन से अज्ञान, भय और दुःख दूर होकर ज्ञान, विश्वास और आनंद का उदय होता है।
माता शैलपुत्री नवदुर्गा की प्रथम स्वरूपा हैं। हिमालय की पुत्री होने के कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ा। ये नंदी वाहन पर सवार होकर, दाएँ हाथ में त्रिशूल और बाएँ हाथ में कमल धारण करती हैं। शैलपुत्री माता को शक्ति, भक्ति और अटूट विश्वास का प्रतीक माना जाता है। उनकी आराधना से जीवन में स्थिरता, साहस और आत्मविश्वास की प्राप्ति होती है। माता शैलपुत्री का स्मरण करने से सभी दुख, भय और बाधाएँ दूर होती हैं तथा मन को दिव्य शांति का अनुभव होता है।
माता ब्रह्मचारिणी नवदुर्गा की द्वितीय स्वरूपा हैं। वे तप, त्याग और संयम की देवी कही जाती हैं। हाथ में जपमाला और कमंडल धारण किए, माता ब्रह्मचारिणी की उपासना से साधक को असीम धैर्य, ज्ञान और वैराग्य की प्राप्ति होती है। उनकी कृपा से जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं और आत्मबल की वृद्धि होती है। जो भक्त श्रद्धा और निष्ठा से ब्रह्मचारिणी माता का ध्यान करते हैं, उन्हें धर्म, सत्य और साधना के मार्ग पर सफलता मिलती है।
माता चन्द्रघंटा नवदुर्गा की तृतीय स्वरूपा हैं। इनके मस्तक पर अर्धचन्द्र की भाँति चमकती हुई स्वर्णिम घंटी सुशोभित रहती है, इसी कारण इन्हें चन्द्रघंटा कहा जाता है। ये सिंह पर आरूढ़ होकर दस भुजाओं में विविध अस्त्र-शस्त्र धारण करती हैं। माता चन्द्रघंटा शौर्य और पराक्रम की देवी हैं, उनकी उपासना से साधक को साहस, निर्भयता और विजय प्राप्त होती है। इनके दिव्य स्वरूप का ध्यान करने से सभी शत्रु और बाधाएँ नष्ट होती हैं तथा घर-परिवार में सुख-शांति और समृद्धि का वास होता है।
माँ कूष्माण्डा नवदुर्गा की चतुर्थ स्वरूपा हैं। इन्हें ब्रह्माण्ड की सृजनकर्ता माना जाता है। अपनी दिव्य मुस्कान से माँ कूष्माण्डा सम्पूर्ण सृष्टि को ऊर्जा और प्रकाश प्रदान करती हैं। इनके आठ भुजाओं में विविध अस्त्र-शस्त्र, जपमाला और अमृतपात्र शोभायमान रहते हैं, इसी कारण इन्हें अष्टभुजा देवी भी कहा जाता है। माँ कूष्माण्डा की उपासना से साधक को आयु, स्वास्थ्य, बल और तेज की प्राप्ति होती है। उनकी कृपा से जीवन के अंधकार मिटकर सुख, समृद्धि और उन्नति का प्रकाश फैलता है।
माता स्कंदमाता नवदुर्गा की पंचम स्वरूपा हैं। वे भगवान कार्तिकेय (स्कंद) की माता होने के कारण स्कंदमाता कहलाती हैं। माता स्कंद को गोद में लेकर सिंह पर सवार होती हैं और उनके चार हाथों में कमल और आशीर्वाद की मुद्रा शोभायमान रहती है। इनका स्वरूप करुणा, मातृत्व और भक्ति का प्रतीक है। स्कंदमाता की उपासना से साधक को ज्ञान, मोक्ष और अपार शांति की प्राप्ति होती है। उनकी कृपा से घर-परिवार में प्रेम, सौहार्द और समृद्धि का वास होता है।
माता कात्यायनी नवदुर्गा की षष्ठम स्वरूपा हैं। महर्षि कात्यायन की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर देवी ने उनके घर पुत्री रूप में जन्म लिया, इसी कारण इन्हें कात्यायनी कहा जाता है। ये सिंह पर सवार होकर चार भुजाओं में कमल, तलवार और आशीर्वाद की मुद्रा धारण करती हैं। माता कात्यायनी साहस, बल और विजय की अधिष्ठात्री देवी हैं। उनकी उपासना से साधक को शौर्य, आत्मविश्वास और जीवन के सभी संघर्षों में सफलता प्राप्त होती है। देवी कात्यायनी का पूजन विशेषकर विवाह योग्य कन्याओं के लिए अत्यंत फलदायी माना गया है।
माता कालरात्रि नवदुर्गा की सप्तम स्वरूपा हैं। इनका स्वरूप अत्यंत उग्र और शक्तिशाली है, किंतु वे भक्तों को सदैव शुभ फल ही प्रदान करती हैं। इसलिए इन्हें शुभंकारी भी कहा जाता है। माता कालरात्रि काले वर्ण, बिखरे केश, वज्र और खड्ग धारण किए हुए, गर्दभ (गधे) पर सवार रहती हैं। इनके दर्शन मात्र से ही सभी दुष्ट शक्तियाँ, भूत-प्रेत और नकारात्मक ऊर्जा नष्ट हो जाती है। माता कालरात्रि की उपासना से साधक के जीवन से भय और शत्रुता दूर होकर साहस, सुरक्षा और शुभ फल की प्राप्ति होती है।
माता सिद्धिदात्री नवदुर्गा की नवम और अंतिम स्वरूपा हैं। वे समस्त सिद्धियों और शक्तियों की दात्री हैं, इसीलिए इन्हें सिद्धिदात्री कहा जाता है। माता कमलासन पर विराजमान होकर चार भुजाओं में गदा, चक्र, शंख और कमल धारण करती हैं। उनकी कृपा से साधक को अद्भुत सिद्धियाँ, ज्ञान और आत्मबल की प्राप्ति होती है। देवी सिद्धिदात्री की उपासना से मनुष्य के जीवन से सभी दुख, संकट और अज्ञान का नाश होकर सुख, शांति और सफलता का मार्ग प्रशस्त होता है। ब्रह्मांड के देवता, असुर, सिद्ध और साधक सभी उनकी कृपा के लिए तत्पर रहते हैं।